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Tuesday, 13 April 2021

कोरोना और भारत

ऐसे जीतेगा भारत कोरोना से?


कोरोना महामारी अपने भयानक रूप में हमारे सामने खड़ी है। ऐसे में चुनावी/राजनीतिक रैलियों का समर्थन यदि आप करते हैं तो निश्चित ही आप में शर्म का एक कण भी नहीं बचा है। सुबह हज़ारों-लाखों की भीड़ इकट्ठा कराने वाले हमारे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री और पार्टियों के नेता/कार्यकर्ता, शाम को मास्क लगा कर, दो गज की दूरी रखने का ऐलान करते हैं। पश्चिम बंगाल की हालत चुनाव खत्म होते ही बदतर हो जाएगी, ये हम सबको पता है। किसी भी बात का ध्यान न रखते हुए देश के प्रधानमंत्री / गृहमंत्री एवं राज्य की मुख्यमंत्री ने लाखों लोगों की ज़िंदगी को मज़ाक बना दिया है।

 गृहमंत्री का पश्चिम बंगाल में चुनावी रोडशो
फ़ोटो साभार : द प्रिंट 

ममता बैनर्जी का पश्चिम बंगाल में चुनावी रोडशो
फ़ोटो साभार : इंडिया टुडे

दूसरी ओर हरिद्वार में हो रहे कुम्भ मेले की बात की जाए तो आस्था से ओतप्रोत भक्तों के धर्म पर आँच आने लगती है। कई लोगों का कहना है कि इनके साथ तबलीगी जमात जैसा सलूक क्यूँ न किया जाए या कोरोना/मानव बॉम्ब क्यूँ न कहा जाए तो अलग अलग कारण बताए गए। 
ज्ञात हो सुप्रीम कोर्ट ने तबलीगी जमात से जुड़े केस में केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी। चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और वी. रामासुब्रह्मण्यम की बेंच ने गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020 को इस मामले में सुनवाई की थी. सरकार के हलफनामे को ‘जवाब देने से बचने वाला’ और ‘निर्लज्ज’ करार दिया. कहा कि याचिकाकर्ताओं ने कुछ टीवी चैनलों पर जो आरोप लगाए थे, उसका इसमें कोई जिक्र नहीं है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने कहा-
"सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव की बजाय अतिरिक्त सचिव ने यह हलफनामा दाखिल किया है. इसमें जमात के मुद्दे पर अनावश्यक और बेतुकी बातें कही गई हैं. आप कोर्ट के साथ इस तरह से व्यवहार नहीं कर सकते. यह बहुत अपमानजनक है. इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।"

सुनवाई के दौरान जमात की ओर से पेश वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने कहा कि केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा है कि याचिकाकर्ता बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी का हनन करने की कोशिश कर रहे हैं. इस पर चीफ जस्टिस ने केंद्र की आलोचना करते हुए कहा-
"आप लोगों (सरकार) की तरह हर किसी को बोलने का अधिकार है. वैसे भी हाल के दिनों में बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस अधिकार का सबसे अधिक दुरुपयोग हुआ है।"
और अगर बात की जाए हरिद्वार में हो रहे कुंभ मेले की तो यहाँ कहा गया कि बहुत सी व्यवस्थाएं की गई हैं जैसे चैक पॉइंट्स ताकि कोई भी पॉजिटिव व्यक्ति नगरीय सीमा में प्रवेश न करे, इसके लिए उसे कम से कम 72 घंटे पहले हुई कोरोना जाँच रिपोर्ट ही दिखानी होगी। इसके अलावा श्रद्धालु वहाँ भी जाँच करा सकते हैं। और भी कई विभिन्न तरह की व्यवस्थाओं का ज़िक्र किया गया परंतु क्या सिर्फ़ व्यवस्थाओं से संक्रमण रुक जाता है? रविवार, 11 अप्रैल को हरिद्वार में 400 से ज्यादा नए कोरोना केस सामने आए।इसमें अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी सहित जूना अखाड़े के करमा गिरी और जूना अखाड़े के नितिन गिरी भी शामिल हैं। कुंभ मेला आईजी संजय गुंज्याल ने बताया है कि 12 अप्रैल को महाकुंभ का सोमवती अमावस्या का दूसरा शाही स्नान, 13 अप्रैल को नव संवत्सर का स्नान और 14 अप्रैल को बैसाखी का तीसरा शाही स्नान है। सोमवार, 12 अप्रैल को पिछले 24 घंटे के दौरान हरिद्वार में 408 कोरोना पेशेंट मिले। सोमवार को गृह सचिव आनंद वर्धन और पर्यटन सचिव दिलीप जावलकर की कोरोना जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई है।

हरिद्वार महाकुंभ में साधुओं का जमावड़ा
 फ़ोटो साभार : गोकुलदास फ़ोटोग्राफी (इंस्टाग्रा्म)
      
शाही स्नान से पहले जब कुंभ मेला आईजी संजय गुंज्याल से पत्रकारों की बात हुई तो उन्होंने कहा कि, "हम लोगों से लगातार लोगों से कोविड नियमों के पालन करने की अपील कर रहे हैं लेकिन भारी भीड़ के कारण यह व्यावहारिक रूप से असंभव है, खासकर घाटों पर लोगों से सामाजिक दूरी जैसे नियम का पालन करा पाना बहुत ज्यादा मुश्किल है। लोग बिना मास्क लगाए मेले में नजर आ रहे हैं।"

शाही स्नान करता हुआ साधुओं का जत्था
फ़ोटो साभार : उत्तराखंड पुलिस (इंस्टाग्रा्म)
         
और यदि वास्तविकता का ध्यान रखते हुए देखा जाए तो 12 अप्रैल को सरकारी आँकड़ों के हिसाब से 31 लाख लोगों ने शाही स्नान किया। तो क्या 31 लाख लोगों की रिपोर्ट का ध्यान रख पाना मुमकिन है? मुझे तो नहीं लगता आप ज़रूर बताइयेगा।
तबलीगी जमात के लोगों को तो कोर्ट ने बरी कर दिया, सिर्फ़ कुछ मीडिया के लोगों ने उस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग दिया, आपको दूसरे धर्म के बारे में भड़काया, चैनल की टी आर पी बढ़ायी, और आपने बुरा बोलने करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। व्यवस्थाओं को ताक पर रखते हुए आज आपके धर्म के लोगों की वजह से महामारी फैल रही है तो तु तु मैं मैं में वक़्त न गवाएँ। ग़लत को ग़लत कहें और अपना ज़मीर बचाए रखें।
जो मुझसे पूछ रहे हैं कि क्या किया जाए तो सरकार जानती है कि लॉकडाउन इलाज नहीं है और इस तरह के आयोजन से संक्रमण बढ़ेगा ही। तो कुंभ नहीं भी होता तो फ़र्क़ नहीं पड़ता, धर्म, संस्कृति और रीति रिवाज़ के होने के लिए इंसान का होना ज़रूरी है, आप इंसान को ख़त्म किये दे रहे हो, क्या बचा पाओगे? मास्क पहनना, हाथ धोना, हाथ से मुँह, नाक को न छूना, दूरी बनाए रखना कोई बहुत कठिन काम नहीं है पर आज के समय के लिए सबसे बड़े और ज़रूरी काम हैं। इन सब के अलावा जो हम कर सकते हैं वो ये कि जिसकी जैसी मदद कर पाएं करें। किसी से बात कर लें, शायद उसे अच्छा लगेगा। किसी भूखे को खाना खिला दें। सोशल मीडिया की मदद से या संपर्कों की मदद से ज़रूरतमंद के लिए प्लाज़्मा की व्यवस्था करा दें। ये हमारे लिए बहुत है। हम सरकारें मंदिर/मस्जिद, धर्म/जात जैसे मुद्दों के लिए चुनते हैं तो स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ज़रूरतों की हमें ख़ुद व्यवस्था करनी होगी।

तस्वीर में दिख रहा हाल पूरे देश का है 
फ़ोटो साभार : तेलंगाना टुडे
 
                    
खैर, मसानों पर न तो जगह है न लकड़ी। सड़कों पर लाशें जल रहीं हैं। लोग अपनों के चेहरे देखने को तरस रहे हैं। अपने पाप धोने के लिए आप शाही स्नान तो कर लेंगे परन्तु आप के कारण किसी की जान जाती है तो उस पाप का क्या? और किसी एक की नहीं कितनों की ही जान जा रही हैं, जो बच रहा है वो इलाज़ के खर्चे में कंगाल हुआ  जा रहा है, उनकी बद्दुआएँ आसमाँ में दूषित हवा बनकर उड़ रही हैं। ऐसे में राँझणा पिक्चर का एक डायलॉग याद आता है, जिसे हम सभी को गाँठ बांध लेना चाहिए!
"दुनिया की किसी गंगा में, किसी दरगाह के किसी धागे में वो ताक़त नहीं जो इंसान को इंसान का कत्ल माफ़ करे!! जाओ कुछ करो!! मुझे नहीं पता क्या करो, लेकिन यहाँ गंगा किनारे मुक्ति मिलने से तो रही मेरे दोस्त!!"
- प्रद्युम्न पालीवाल

Tuesday, 19 March 2019

11.तुम

तुम


Photo Credit :- Pradyumn Paliwal 

(प्रद्युम्न पालिवाल)

क शाम जब मंदिर के पार्क वाली मुँडेर पर बैठकर एक नयी किताब की तरह मुझ से मिली थीं तुम, तब मैंने ये जाना था कि किताब में मौजूद अध्याय (chapter) के अंदर कई नाकारात्मक अनुच्छेद (negative paragraph) भी पाए जाते हैं।

मैं पहली बार किसी ऐसी किताब को पढ़ने की कोशिश कर रहा था और किताब मुझे ख़ुद कुछ वाक्य पढ़ा रही थी। इतने लगाव के साथ निराशा से भरे शब्दों को सुनना कैसे मुमकिन है, आज मैं हैरान हूँ ये सोचकर। हर एक शब्द को सांत्वना देता हुआ मैं आगे बढ़ गया, और वो किताब उस दिन से मुझे प्रिय हो गयी। 

किताब के प्रिय होने का कारण सिर्फ इतना था कि मैंने उसे पढ़ते वक्त महसूस कर लिया था और महसूस की हुई कोई भी चीज़ आपके हृदय के बहुत करीब होती है!!

Photo Credit :- Pradyumn Paliwal 

(प्रद्युम्न पालिवाल)


मैं रोज़ उस शाम का, उस वक्त का इंतज़ार करता था कि अचानक मैंने पाया कि ये शाम आज भी वही है, वक्त कहीं नहीं गया, किताब आज भी मेरे पास है और पहले से ज़्यादा प्रिय भी बस मैं ही उसे पढ़ नहीं पा रहा।

तुम्हें न पढ़ पाने का कारण ये तो नहीं हो सकता है कि मुझमें अब इतनी निराशा को सहन करने की शक्ति नहीं है या ये भी नहीं कि तुम ख़ुद नहीं चाहतीं कि मैं पढ़ूँ वो पन्ने जो तुम्हारा फाड़ कर फेंक देने का मन करता है।

मुझे लगता है अब मैं पढ़कर तुम्हारे वाक्य, शब्दों को सांत्वना नहीं दूँगा बल्कि कर दूँगा बगावत , कहानी के हर उस किरदार के ख़िलाफ़ जो करता है ज्यादती और घटिया किस्म की ओछी हरकतें तुम्हारी कहानी में।

और फिर,

प्रिय होते हुए भी मैं तुम्हें नहीं पढ़ पाउँगा क्योंकि तुम्हें बगावत नहीं शाँति प्रिय है!!

-प्रद्युम्न पालीवाल

Monday, 3 December 2018

10. घर!!


"हमारा घर!!"


Photo Credit :- Pradyumn Paliwal 

(प्रद्युम्न पालिवाल)










मुझे साहित्य में शुरू से ही दिलचस्पी रही है। कुछ टूटी फूटी कविताएं भी लिखता रहा हूँ और कभी उर्दू का शौक चढ़ता तो ग़ज़ल लिखने बैठ जाता। शौक तो उसे भी था, कई बार किताबें दी थीं उसे, खासकर दुष्यंत की साए में धूप। वह जो भी लिखती थी अंग्रेजी में लिखती थी। एक मैं था जो अंग्रेजी से तंग सिर्फ हिंदी समझता था,  शायद इसीलिए मैंने उसे समझा, उसके लिखे को नहीं!!

यूँ ही एक बार, सर्दियों की शाम थी, 6 बजे अँधेरा हो गया था, ठंडी हवा चल रही थी और किसी पार्क में हम दोनों चप्पलें उतार एक बेंच पर उकड़ूं  बैठे हुए थे!! 

तब पूछा था उसने मुझसे, "तुम्हारे सपनों का घर कैसा होगा??"

"बस कुछ किताबें चाहिए, प्रकृति के बीच जहाँ भूख मिटाने लायक खाना हो, बस फिर तो एक झोपड़ी भी मेरे सपनों का घर होगा", मैं बोला।

और अगले ही पल,मैंने पूछ लिया, "तुम्हारे सपनों का घर कैसा होगा??"

और उसने कहा, "पहाड़ों के बीच, एक लकड़ी का घर, जिसमें मैं उस व्यक्ति के साथ रहूँ जिसे मैं सबसे ज्यादा प्यार करूँ!!"

पता करने की कोशिश में उससे यही सुन पाया, "नहीं पता, भविष्य नहीं देखा मैंने पर कोई तो होगा।"

अब मेरे मन में दो बातें थीं, पर मैंने यह कह पाना उचित समझा, "मैंने भी तो ऐसे ही घर की बात की थी।"

और कुछ देर की चुप्पी के बाद, जब मन नहीं माना तो मैंने उससे पूछ लिया, "क्या वह व्यक्ति मैं हो सकता हूँ??"

तो बोली, "हाँ!! मैं एक और कमरा बनवा लूँगी, तुम आकर रह सकते हो।"

मुस्कुराते हुए हम पार्क से निकल कर टपरी पर गए, चाय पीने के बाद जब उसने कहा, "मैं जा रही हूँ।"

तो केदारनाथ सिंह जी की कविता याद करते हुए मैं बोल पड़ा, "जाओ।"

जबकि मैं अब समझ रहा था कि हाँ, 'जाना' हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया क्यूँ है!!
और निकल गए हम अपने अपने रास्ते।

Photo Credit :- Pradyumn Paliwal 

(प्रद्युम्न पालिवाल)



कल वह फिर मिली थी मुझे, यूँ ही बातों के बीच मैंने पूछ लिया, "तुम्हारी चाह क्या है?"
"संसार..." जवाब आया।

हालाँकि, इस जवाब  के बारे में मैंने सोचा नहीं था, तो अपने आप को देखते हुए, मैं हंसते हुए बोला, "पर मेरे पास तो खुद का घर भी नहीं, संसार कहाँ से दूँगा, हाँ! अगर तुम मुझे ही संसार मान बैठी हो, तो मैं हाजिर हूँ!!"

वह मुस्कुराई और बोली, "किराए का मकान तो है।"

तो मैं फिर बोल बैठा, "मकान मालिक का है, जब चाहे लात मार के निकाल सकता है।"

एक ठहराव के बाद उसने कहा, "हम हमारा घर बनाएंगे ।"

मैं पूर्ण समर्पण के साथ कह रहा था "उसके लिए पहले 'तुम्हें' और 'मुझे' मिलकर होना पड़ेगा 'हम', कमाना पड़ेगा एक 'मकाँ' और मुद्दतों बाद उसे बना पाएंगे एक 'घर'।"

"हमारा घर" 
वह ख़ुश थी!! 
और मैं उसकी ख़ुशी में खोया हुआ!!

- प्रद्युम्न पालीवाल

Sunday, 18 November 2018

ऋषिकेश - २

ऋषिकेश - २



Photo Credit :- Pradyumn Paliwal 

(प्रद्युम्न पालिवाल)



अक्सर गंगा के घाट पर आने वालों का ताँता लगा रहता है, कोई फ़र्क नहीं पड़ता घाट बनारस का है, इलाहाबाद (प्रयागराज) का या कलकत्ता का!!



फ़र्क पड़ता है जब घाट हो ऋषिकेश का, जहाँ गंगोत्री से निकली पतितपावनी त्रिपथगामिनी माँ भागीरथी पृथ्वी का स्पर्श करती है!


त्रिवेणी घाट, ऋषिकेश, जब घाट पर तुम्हारी नज़र चारों ओर दौड़ती है तो तुम देख पाते हो कि एक 45 वर्ष का व्यक्ति, सफ़ेद कपड़े पहने हुए, अर्घ दे रहा है और नमस्कार कर रहा है अस्त होते हुए सूर्य को!!

"क्या जाने वाले के साथ ऐसा किया जाना चाहिए??"


Photo Credit :- Pradyumn Paliwal 

(प्रद्युम्न पालिवाल)


आवाज़ आती है,"परम्पराएँ तो मना नहीं करतीं!!" 

कौन बोला?, कोई दिखाई तो नहीं देता पर बात करने में क्या हर्ज़ है!!

तुम पूछते हो,"ये किस भावना से ये कार्य कर रहा है?"

"यहाँ आते तो सब आस्था और श्रद्धा की भावना से ही हैं, फिर रास्ते में कुछ याद आ जाए तो वो यहाँ मांग लेते हैं, पर आदमी भी क्या जीव है, जो आता है वो सुखः और समृद्धि माँगता है!"

"किसकी और कितनी सुखः और समृद्धि की चाह है आदमी को?"

" बहुत सही बात पर आये हो, क्योंकि यहाँ आये हर आदमी को अपने लिए सब कुछ नहीं चाहिए!!"

"फ़िर"

"किसी को फ़िक्र है बच्चों की , किसी को पुरखों की , तो कई पूरे खानदान की चिंता लिए बैठ जाते हैं यहाँ और आग्रह होता है कि इनके पास भी हँसी ख़ुशी के पल रहें!"

"तो क्या होता है वैसा, जैसा ये चाहते हैं??"

"भई, माँगने से हो रहा होता तो यहाँ भी क्यों आना पड़ता!"

"तो माँगने से क्या?"

"संतुष्टि, आत्मसंतुष्टि , ये आदमी जो भी कार्य आस्था, श्रद्धा, विश्वास की भावना से करता है, वो कार्य उसे ले जाता है आत्मसंतुष्टि की ओर, और यही वह भाव होता है जिसके बाद मनुष्य नहीं सोचता की अब किसी भी प्रकार की चिंता की आवश्यकता है!" 

"पर यदि सुखः नहीं आया??"

"कब तक?? सुखः, दुःख तो ऐसे हैं जैसे दिन और रात, कोन कहता है कि चाँद न निकलेगा, कब तक छाए रहेंगे बादल, क्या अमावस कभी ख़त्म नहीं होगी? क्या वो शीतलता नसीब ही नहीं होगी??"


Photo Credit :- Pradyumn Paliwal (प्रद्युम्न पालिवाल)


"ये लोग इतने विश्वास, श्रद्धा की भावना कैसे ले आते हैं अपने अंदर?" 

"भावना लाई नहीं जातीं, उतपन्न होती हैं!! कई बार जब कोई सहारा नहीं होता और प्रार्थना के समय कोई उम्मीद की किरण दिख जाए तो विश्वास उतपन्न होता है, और समय के साथ जब वह किरण एक पूर्ण सूर्य का रूप ले लेती है तब स्थापित हो जाती है उस विश्वास की, आस्था की भावना!" 

"कमाल है ना, मैं कब से यहाँ हूँ पर अभी तक इस भावना के बीज का सृजन नहीं हुआ मुझमें!!"

"बीज का सर्जन तो हो चुका है वर्षों पूर्व, और किसी ख़ूबसूरत हादसे से वो बीज अंकुरित भी हो चुका है, हाँ अभी विश्वास का पौधा है इक जो तुम्हें नज़र नहीं आ रहा परन्तु चिंता की बात नहीं है, जल्द ही मिलोगे उस विश्वास की भावना से!"

"अभी के लिए, एक आखिरी सवाल , तुम ये कैसे कह सकते हो की उस भाव का पौधा है??"

"तुम्हें पता नहीं है ये आवाज़ किसकी है??, 
 "नहीं!!"  
"पर तुम बात कर रहे हो ना!!, 
और बिना विश्वास किसी अज़नबी आवाज़ के साथ इतनी देर कोन बैठ पाता है??"

- प्रद्युम्न पालीवाल

ऋषिकेश - १

ऋषिकेश - १


Photo Credit :- Pradyumn Paliwal 

(प्रद्युम्न पालिवाल)

कई जगहों पर अपनत्व महसूस होता है, ऋषिकेश, उत्तराखंड उन्हीं में से एक है!!
बावजूद 13 या 14 डिग्री तापमान के तुम गंगा किनारे बैठे रहो, सामने से मुँह पर पड़ती शीत लहर, लगातार बहता बर्फ़ सा गंगाजल, कई बार पूरे घाट पर अकेले और बढ़ता हुआ अँधेरा, और कभी उठ कर जाने लगो तो मानो वहाँ उपस्थित हर जीव-निर्जीव तुम्हारा कुर्ता खींचते हुए बोले - "कहाँ जा रहे हो?? बहुत कम अपने लोग हमारे पास आते हैं!"

Photo Credit :- Pradyumn Paliwal 

(प्रद्युम्न पालिवाल)


तुम सोचोगे कि बोला जाए-"समय कम है, मेरी ट्रैन है" या कोई और नया बहाना।

पर सामने से आवाज़ आएगी,-"हाँ, बहुत से बहाने होंगे तुम्हारे पास, समय की कमी या गाड़ी का निकल जाना, पर क्या एक बहाना नहीं है रुकने का?" 


तुम फिर सोचोगे, पर एक और करुणापूर्ण भावुक आग्रह "कुछ देर ही सही, तुम भी तो बहुत कुछ कहना चाहते हो, दबाए बैठे हो सब, अपनी ही चार बातें कर लेना,और..."


और अचानक तुम बोल उठोगे "हाँ, ठीक है! मैं यहीं हूँ, कहीं नहीं जा रहा, आओ कुछ बात करते हैं!"


फिर हो जाएगी सुबह यूँ ही बैठे-बैठे, बात करते-करते, हर उस जीव-निर्जीव से जिस ने रोका है तुम्हें वहाँ!


और समझोगे तुम की अंतर क्या है, 

तेरा-मेरा और अपना में!

- प्रद्युम्न पालीवाल। 

Tuesday, 3 April 2018

7. वो लम्हा!!!


वो लम्हा!!!




Photo Credit :- Prafful Bhargava 

(प्रफुल्ल भार्गव)

वहाँ कदम रखते ही मुझे लगा कि मानो सब ओर से बहुत सारी उम्मीदें मुझे आवाज़ दे रही हैं!!

मैं हर तरफ मुड़ा, हर उम्मीद लगाती हुई आवाज़ की और देखा फिर उस उम्मीद को सफल करने का परिणाम सोचा और कई बार उम्मीदें मेरी औकात से बड़ी थीं तो कई बार मेरा अहम उन उम्मीदों से बड़ा निकलता, कई बार उन उम्मीदों की आवज़ मैं नहीं सुन पाया जो सिर्फ मेरे लिये थीं क्योंकि वहाँ शोर बहुत था और हम अक्सर कुछ चीज़ों को यूंही नज़रअंदाज़ भी कर देते हैं।


Photo Credit :- Prafful Bhargava 

(प्रफुल्ल भार्गव)

मैंने कुछ आगे बढ़ा ही था कि कुछ आंखें जिनमे असंख्य सपने जो पूरा होना चाहते हैं और कर रहे हैं कुछ जद्दोज़हद शायद खुद को आँखों के पिंज़रे से बाहर निकालने की और आँख एक माँ की तरह रोक रही है सपनों को क्योंकि वो शायद बस इतना चाहती है की जब तक उसके सामने ऐसा रास्ता नहीं आ जाता जहाँ सपने पूरे होने के लिये आगे बढ़ सकें वह उन्हें खुद से दूर नहीं होने देगी। वे आंखें जो सपने पूरा करना चाहती हैं वे या तो भुखमरी की शिकार थीं या हुनरमंद कलाकार या दोनों ही, जो चाहती थीं कि सपने मुकम्मल हों तो फिर उनके आगे पेट भरने की समस्या नहीं आए।

वहीं थोड़ी आगे हिम्मत कुछ करतब कर रही थी। नीचे जला देने वाली आग और ऊपर वो हवा जिसमें जलते ही हिम्मत की राख उड़ जायेगी और फैला देगी चारों ओर ऐसी ही हिम्मत वहाँ घूमते मुझ जैसे कुछ लोगों में। सिर्फ यही नहीं एक हिम्मत थी जिसे लोगों ने विज्ञान का नाम दे दिया था पर शायद उनकी जान जिसे वे दो/चार पहियों पे लिये गोल-गोल घुमाये जा रहे थे वो विज्ञान से ज़्यादा हिम्मत का समर्थन कर रही थी।

कुछ हाथ भी मैंने देखे जो शान-ए-खुद्दारी से एक छल्ले में ज़रा सी मोहब्बत फूंक रहे थे जिससे बने कुछ बुलबुले हंसते-मुस्कुराते हुए यहाँ-वहाँ घूम रहे थे।

हाथी और ऊंट की सवारी करता हुआ बचपन खिलखिला रहा था क्योंकि उसके पीछे बैठी थी एक ज़िम्मेदारी जिसे पिताजी, बाबूजी, पापाजी या आप DAD कह सकते हैं और उस ज़िम्मेदारी ने बचपन का पूरा डर खाक में मिला दिया था।


Photo Credit :- Prafful Bhargava 

(प्रफुल्ल भार्गव)

चूंकि मुझे ऐसी जगह ज़्यादा देर रहना पसंद नहीं है जहाँ जन-समूह की तादाद बिना किसी कारण बढ़ी हुई हो तो मैं चुपचाप उस मेले के आखिरी और पसंदीदा पड़ाव यानी कि झूलों के पास आया और सबसे ऊंचे चक्के (GIANT WHEEL) में बैठ गया और जब ऊंचाई पर पहुंच कर नीचे देखा तो पलभर की अनुभूति कुछ यूं थी कि उम्मीदें, सपने, भूख, कला, हिम्मत, विज्ञान, खुद्दारी, मोहब्बत, हंसना-मुस्कुराना, खिलखिलाना, यहाँ तक कि ज़िम्मेदारी भी नीचे छूट चुकी थी और मेरे साथ सिर्फ मैं था एक शाश्वत रूप में, वो मैं जो पल भर को मोक्ष पा गया था।

और फिर कभी मुझे इन एहसासों ने नहीं छुआ, शायद मैं कुछ गुरूर में था क्योंकि अरसे हुए मैंने मेले में कदम नहीं रखा पर अब जी करता है एक बार फिर उस लम्हे को समेटने का और अपने अंदर किसी कोने में छुपा कर रख लेने का !!!

क्या अब वो लम्हा आयेगा??
शायद ,
हाँ  
या  
ना!!!!


-प्रद्युम्न पालीवाल

Monday, 19 March 2018

6. ऊँचाई


ऊँचाई



Photo Credit :- Prafful Bhargava 

(प्रफुल्ल भार्गव)


ऊँचाई, कई लोगों को देखा है मैंने जिन्हे ‘ACROPHOBIA’ है यानी ऊँचाई से डर लगता है पर फकत ये अर्थ नहीं है ऊँचाई का। जिस ऊँचाई का मैं आपसे ज़िक्र करना चाहता हूँ कम्बखत उस ऊँचाई से किसीको डर नहीं लगता परन्तु सबको अत्यंत प्रिय है, मुझसे आज तक ऐसे व्यक्तित्व का सामना नहीं हुआ जिसे वो तथकथित ऊँचाई नहीं चाहिये।

तथकथित ऊँचाई को सिर्फ मान सम्मान तक सीमित न रखा जाये अन्यथा ये ऊँचाई का अपमान होगा और इस दौर में कोई भी अपमानित शख़्स ऊँचाई का प्रतिनिधित्व करते हुए आप और मुझ पर मानहानि का मुकदमा ठोक सकता है!! दरअसल इस ऊँचाई से अभिप्राय दौलत, शौहरत और ओहदा जैसी सांसारिक उपलब्धियों से भी है!!

चुंकि हम मनुष्य हैं तो यह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है कि हम ऊँचाई से न डरें, पर कुछ चीज़ें ज़मीन पर अच्छी लगती हैं इस बात को भी नहीं भूलना चाहिये। साग़र आज़मी का एक शेर है,
शोहरत की फ़ज़ाओं में इतना न उड़ो 'साग़र'
 परवाज़ न खो जाए इन ऊँची उड़ानों में॥

उङान भरना गलत नहीं है और न ही होगा पर ये भी सही तभी तक है जब तक वो उङान (आकाशीय अश्वमेघ की अद्वितीय नायिका, करोड़ों भारत-पुत्रियों के मन-मस्तिष्क में कल्पना-जडित, हौसले भरी उड़ान का स्वप्न जगाने वाली, गीता की कर्मशील पाठिका, हमारे युग को साहस की भारतीय व्याख्या देने वाली) कल्पना चावला की उङान हो या वो उङान जो (अपने शोध-क्षेत्र अनंत-आकाशकी प्रयोगशाला के लिए ईश्वर के सर्वाधिक प्रिय शोधार्थी) स्टीफ़्न ह्वाकिंग्स ने भरी और इन उङानों पर हमें गर्व होना चाहिए।

उङान या ऊँचाई कमाई जाती हैं जिसके लिये डॉ कुंवर बैचैन कह गये हैं कि,
उस ने फेंका मुझ पे पत्थर और मैं पानी की तरह,
 और ऊँचा और ऊँचा और ऊँचा हो गया॥

इस ऊँचाई को कई लोग बड़प्पन कह कर टाल देते हैं कई लोग गालियां भी देते हैं पर याद रखिये कि कहा जा चुका है कि माफ करने वाला बड़ा होता है।

और ये वो ज़माना है जहाँ कुकर्म किये बिना कोई उङान भरे तो वह खुद अचम्भित हो जाता है कि यह हुआ कैसे, और जो उसे जानने वाले लोग हैं वे भी यही चाहते हैं कि इतने गलत काम करता है ये उङान जरुर भरे बस दोनों उङानों में अंतर होता है।
मुझे व्यक्तिगत तौर पर किसीकी तरक्की से कोई दिक्कत नहीं है, सिर्फ मैं हि नहीं आप भी सभी के सामने यही कहते हैं और आप मानें या न मानें यह एक सफ़ेद झूठ है। जिस दिन यह झूठ सच हो जाएगा आप खुद-ब-खुद
ऊँचे हो जाएंगे।

मेरा विचार फ़कत यही है कि
सब जायज़ है शोहरत की ज़द को,
इस छोटी सोच की ऊँचाई पे आदम है!!

क्योंकि यदि सब जायज़ हो गया तो आप और मैं ज़िंदा रहैं ये भी जरूरी नहीं है, और आप खुद की नज़र में ऊँचे होना चाहिए वरन इस दुनिया ने तो सीता से भी अग्निपरीक्षा मांगने के बाद उसे बद्नाम कर दिया था
देखो,
मेहनत में चप्पल क्या, बदन तक घिस डाला,
यार हमारे तो घर की भी ऊँचाई कम है!!

पर मैं जब ज़मीर की ऊँचाई देखता हूँ तो मेरा कद बहुत ऊँचा दिखता है मुझे और यही होना भी चाहिए
 दौलत, शोहरत की ऊँचाई से कहीं आवश्यक है आपके ज़मीर की ऊँचाई॥

-प्रद्युम्न पालीवाल

Wednesday, 14 March 2018

5. फ़कीर!!


 फ़कीर


Photo Credit :- Prafful Bhargava 

(प्रफुल्ल भार्गव)


साहिर लुधियानवी का एक शेर है
,

" मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया,                        हर फिक्र को धुऐं में उङाता चला गया॥ "

 २०१६ (2016) सिंहस्थ ऐसे ही साधुओं का मिलन समारोह था, बाबा महाकाल की नगरी अवंतिका (उज्जैन) के हर  शख़्स के अंदर इस शेर को आप देख सकते थे, बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक का यही आलम था कि सब अपनी फिक्रों को उङा चुके थे, और जब नगरी में  एकत्रित हुए नागा साधुओं पर ध्यान जाता है तब शायद कोशिश की जा सकती है वैराग्य को समझने की।
दरअसल, फिक्र को धुऐं में उङाने को ही वैराग्य की प्रारम्भिक अवस्था कहा जा सकता है, जिसे आज की आम भाषा में मोह माया से दूर होना भी कहते हैं। 

Photo Credit :- Prafful Bhargava (प्रफुल्ल भार्गव)



भस्म में रमित सम्पूर्ण तन,
ध्यान में संग्रहित सब मन,
रुद्राक्ष, दंड, भस्म, भगवा,
नागाओं के आभुषण धन!!
 









कुछ ऐसी वेश-भूषा वाले नागा बाबा, आम आदमी और उसकी जैसा देश वैसा भेष वाली सोच से बिल्कुल परे हैं, वो जहाँ मिलेंगे इसी अवस्था में मिलेंगे, क्योंकि यह अवस्था उन्हें गहन तपस्या के बाद हासिल हुई है। ये आप उस तरीके से समझिये जब आपको दिन भर मेहनत करने के बाद मेहनताना मिले और आपको कोई यह बोले कि उस मेहनताने को वहीं छोङ दो, तो भले ही वह एक रुपया हो, यदि आप खुद्दार हैं तो अपनी मेहनत से कमाया एक रुपया भी लेकर ही आयेंगे।

Photo Credit :- Prafful Bhargava 

(प्रफुल्ल भार्गव)

और खुद्दारी एक बहुत अहम बात है जो आपको नागा बाबाओं में मिलेगीये दिन-रात ध्यानहवनतपस्याकरने के बावजूद भी अपना पेट भरने के लिए किसी के आगे हाथ फैलाते नहीं मिलेंगेइन्हें खुद पर और उपरवाले पर उतना ही भरोसा है जितना मर्द सिनेमा में आमिताभ बच्चन को होता है और वो कहते हैं कि,
उपरवाला भूखा उठाता जरूर है, भूखा सुलाता नहीं”
और ये तो मैं भी मानता हूँ कि जिसका कोई नहीं उसका खुदा है। और इन बाबाओं का तो सिर्फ वही है क्योंकि शायद आपको नहीं पता हो नागा बनने की प्रक्रिया में एक पद पिंडदान का भी होता है, सही समझे आप !! बाबा खुद का पिंडदान करते हैं और ये आपके, मेरे और इस पूरी दुनिया के लिये म्रत हो जाते हैं।

Photo Credit :- Prafful Bhargava 

(प्रफुल्ल भार्गव)

हाँ और भी बहुत सारी परीक्षाएं होती है जैसे सर्वप्रथम उस व्यक्ति के बारे में एक एक जानकारी की जाती है, वह किस परिवार से है, पारिवारिक स्तिथी कैसी है, जिसमें सबसे बङा प्रश्न होता है कि वो बाबा क्यों बनना चाहता है, और वह इस लायक है या नहीं और इसमें सफल होने के बाद ब्रह्मचर्य की परिक्षा जहाँ ६(6) माह से १२(12) साल तक लग जाते हैं, और इसमें उत्तीर्ण होने के बाद बाबाओं को महापुरुष बनाया जाता है, जहाँ उनके पांच गुरु बनाये जाते हैं जिन्हें पंच पर्मेश्वर भी कहा जाता है। इसमें आखिरी परिक्षा होती है अंग भंग की जिसे सबसे विषम कहा गया है और उसके बाद एक व्यक्ति असल नागा बाबा बनता है।

मुझे नागा बाबा ही असली फ़कीर मालूम होते हैं, और शायद इतना सब कुछ जानने के बाद आप भी नागा बाबाओं को खुद्दार फ़कीर कहना शुरू कर दें!! मैं सोचता हूँ कि ये हर व्यक्तित्व कितनी ताकत रखता है, मेहनत, द्ढनिश्चयता, संकल्पनिष्ठता, एकाग्रता, ईमानदारी और न जाने कितनी ही खूबी ये अपने अंदर रखे हुए हैं, ऐसे प्रतिद्वंदिता के ज़माने में जहाँ आगे निकलने के लिये आदम किसी भी रिश्ते या व्यक्ति को खत्म करने में तनिक नहीं सोचता, अगर यह बाबा बनने वाले प्रतिभाशाली लोग इस ज़माने में शामिल हो गये तो आपका और हमारा क्या होगा ??

इस प्रश्न का आपका और मेरा जवाब नोमान शौक़ के इक शेर से लिखता हूँ कि,

“ फ़कीर लोग रहे अपने हाल में मस्त,
नहीं तो शहर का नक्शा बदल चुका होता॥

Photo Credit :- Prafful Bhargava 

(प्रफुल्ल भार्गव)


इन सभी प्रतिभा के धनियों को मेरा शत् शत् बार प्रणाम!!!!

‌‌‌‌  - प्रद्युम्न पालिवाल

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